राजा की परेशानी

एक छोटा सा राज्य था। कुल दस-पांच हजार की आबादी रही होगी। जब राज्य था, आबादी थी, तो एक राजा भी था। भले ही छोटा राजा। वैसे भी जब राज्य था, तो सेना, मंत्री, सभासद भी थे।
इस राज्य में पहले अदालतें भी थीं। लेकिन वहां का राजा और प्रजा सभी शांतिप्रिय थे। कभी किसी से किसी का लड़ाई-झगड़ा नहीं होता था। इसलिए फिजूलखर्ची समझ अदालतें बंद कर दी गईं। अपने पड़ोसी राज्यों से राजा के बड़े मित्रतापूर्ण संबंध थे। इसलिए सेना के नाम पर केवल सौ-सवा सौ सैनिक थे। किसी के भी पास तलवार-बंदूकें नहीं थीं। सबके हाथ में बस एक बेंत रहती थी। शांति बनाए रखने के लिए इतना काफी था।

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एक बार राजा एक विचित्र परेशानी में फंस गया। राज्य में पहली बार एक व्यक्ति किसी के घर में चोरी के लिए घुसा। संयोग से वहां मारपीट हो गई। चोर के हाथों एक व्यक्ति मारा गया। सैनिक चोर को पकड़कर राजा के पास ले गए।
राजा ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई। विचार होने लगा कि चोर को क्या सजा दी जाए? चोर के हाथों एक व्यक्ति की हत्या हुई थी। काफी विचार होने के बाद भी कुछ तय नहीं हो सका। इससे पहले ऐसा अपराध किसी ने किया भी नहीं था। इसी से किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उसे क्या सजा दी जाए?

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अचानक एक मंत्री बोला, “महाराज, पड़ोस के राज्य में अदालतें हैं। जरूर वहां इस तरह के मामले आते होंगे। क्यों न इस चोर को दंड के निर्णय के लिए वहीं भेज दिया जाए।”
राजा को यह सुझाव जंच गया। चोर को वहां भेजकर पड़ोसी राजा से एक फैसला लेने की प्रार्थना की गई। राजा की परेशानी टल गई। लेकिन दो दिन बाद ही चोर के साथ राजा की परेशानी फिर लौट आई। पहले से बड़ी होकर। वहां की अदालत ने फैसला दिया, ‘चूंकि इस चोर ने हत्या की है। इसलिए इसका सिर कलम कर दिया जाए।’

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अब राजा के यहां कोई जल्लाद नहीं था। सैनिकों से कहा गया, तो उन्होंने साफ जवाब दे दिया, “हमने किसी की इस तरह हत्या करना नहीं सीखा है। फिर हम इसके लिए रखे भी नहीं गए हैं। हमारे पास एक तलवार क्या, चाकू तक नहीं है।”
राजा ने परेशान होकर फिर मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई। कई दिनों तक विचार मंथन हुआ। अंत में सब लोग इस नतीजे पर पहुंचे कि क्यों न इस चोर की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए। राजा की परेशानी फिर टल गई।

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मगर राज्य में कोई जेल नहीं थी, जहां सजा पाए अपराधी को रखा जाए। इसलिए एक कोठरी बनवाई गई। चोर को उसमें रखा गया। एक पहरेदार नियुक्त किया गया। वह चोर की निगरानी करता था। राजमहल से उसके लिए भोजन भी ले आता था।
राज्य की आमदनी बहुत मामूली थी। राजा के लिए इस पहरेदार का खर्च उठाना भारी पड़ गया। अब इस परेशानी से कैसे मुक्ति मिले? राजा ने फिर मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई।
तय हुआ कि पहरेदार को हटा लिया जाए। चोर जहां जाना चाहे जाए। इस मुसीबत से छुटकारा पाने का यही एक उपाय था।

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अगले दिन चोर की नींद खुली, तो उसने देखा कि वहां पहरेदार नहीं था। दरवाजे भी खुले हुए थे। जब कोई और उसका भोजन लेकर नहीं आया, तो वह स्वयं थाली लेकर राजमहल पहुंच गया। 
फिर तो उस का रोज का यही काम हो गया। राजभवन से भोजन ले आता। फिर खा-पीकर चैन की नींद सो जाता। इस खर्च से राजा की परेशानी फिर बढ़ गई। उसने चोर को कहलवाया, “अब तुम आजाद हो। जहां चाहो, भाग जाओ। कोई कुछ नहीं बोलेगा।” 
मगर चोर ने जवाब दिया, “मैं भागकर अब कहां जाऊंं? लोग मुझे देखते ही गालियां देंगे। मुझे मारने दौड़ेंगे। मुझे मौत की सजा क्यों नहीं दी गई?”

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राजा की परेशानी बढ़ी, तो उसने फिर मंत्रियों से सलाह ली। मंत्रियों ने सोच-विचारकर कहा, “महाराज, इस का भोजन-पानी बंद कर दीजिए। भोजन नहीं मिलेगा, तो स्वयं कहीं निकल जाएगा।”
लेकिन चोर भी जाने को तैयार नहीं हुआ। वह भूखा-प्यासा ही रहने लगा। चोर ने लोगों से गुहार लगाई। वहां के लोगों को लगा कि उस व्यक्ति को इस तरह भूखा रखना तो सचमुच राजा का अन्याय है। उन्होंने राजा से इस बारे में पूछा। राजा ने स्वयं की परेशानी बताई।
बहुत सोच-विचार के बाद लोगों ने राजा से कहा, “राजन, एक उपाय है। इस चोर को भोजन देने में आपको कोई आपत्ति नहीं होगी। इसने गैर इरादतन जो हत्या की है, उसका प्रायश्चित भी हो जाएगा। लोग इसका सम्मान भी करेंगे।”
“वह क्या?” राजा ने प्रसन्नता से पूछा।

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“राजन, पिछले दो साल हमारे यहां अच्छी वर्षा नहीं हुई। इससे मार्गों के किनारे लगे अधिकांश वृक्ष सूख गए। जनता को यात्रा में बड़ा कष्ट होता है। आप इससे मार्गों के किनारे छायादार और फलों वाले वृक्ष लगवाएं। उसके बदले इसे रोजी-रोटी मिलेगी और पूरे राज्य का भला होगा। प्रजा भी इसको यह नेक काम करते देख, गालियां नहीं देगी। इसका आदर करेगी। इसके मन में भी फिर कभी अपराध न करने की भावना पैदा होगी।”
राजा और उसका मंत्रिमंडल इस सुझाव से पूरी तरह संतुष्ट हुए। चोर को भी अच्छा लगा। काम मिला, रोटी मिली, लोगों का प्यार मिला। राजा को भी एक बड़ी परेशानी से मुक्ति मिल गई।

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